नौकर की बांहों में मालकिन का जिस्म kamvasna antarvasna kahani


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नौकर की बांहों में मालकिन का जिस्म kamvasna antarvasna kahani

धीरे-धीरे उनकी शादी को तीन वर्ष बीत गये, किन्तु ऊषा की गोद नहीं भरी। इस कारण वह तनाव ग्रस्त रहने लगी। ऊषा को शक हुआ, कि मनोज में कुछ कमी है, जिसके कारण वह मां नहीं बन सकी। उसने मनोज से इलाज कराने को कहा, तो उसने ऊषा को डपट दिया।
बस… यहीं से दोनों के बीच तनाव बढ़ गया। यद्यपि इस बीच ऊषा ने कई तांत्रिकों की शरण ली, तो उन्होंने भी पति में ही कमी बताई।
कहते हैं कि औरत का शक पत्थर की लकीर होता है। ऊषा को भी शक होने लगा था, कि उसका पति नपुंसक है, जिससे वह कभी मातृत्व सुख प्राप्त नहीं कर पायेगी। इस कारण घर में कलह होने लगी। कलह बढ़ी, तो मनोज ने शराब पीना शुरू कर दिया।
अब वह दुकान बंद कर पहले शराब के ठेके पर जाता, फिर लड़खड़ातेे कदमों से घर पहंुचता। कभी खाना खाता, कभी बिना खाये ही चारपाई पर लुढ़क जाता। ऊषा भी नफरत से भरी रहती थी, तो पति की परवाह ही न करती थी। वह तो उसे ठूंठ समझने लगी थी।
इन्हीं दिनों मनोज ने चक्की चलाने के लिये एक नया नौकर रख लिया। उसका नाम राजेश था।
राजेश हाईस्कूल तक पढ सका था। उसके बाद एक चक्की पर काम करने लगा था। वहीं उसने चक्की चलाना सीखा। कुछ साल काम करने के बाद उसने वहां काम छोड दिया और पिता के साथ खेती करने लगा था।
एक रोज उसे मालूम हुआ, कि मनोज को चक्की चलाने के लिये मिस्त्राी की जरूरत है, तो वह मनोज से मिला। बातचीत व वेतन तय करने के बाद मनोज ने राजेश को नौकरी पर रख लिया।

राजेश गुप्ता मेहनती था। पिसाई भी अच्छी करता था, अतः साल बीतते वह मनोज का चहेता बन गया। राजेश की वजह से उसकी आटा बिक्री भी बढ़ गयी थी। अतः दुकान का सारा भार उसने राजेश को ही सौंप दिया था। राजेश दिन भर की बिक्री का हिसाब-किताब मनोज को सौंप देता, फिर दुकान बन्द कर अपने घर चला जाता।

एक रोज राजेश गुप्ता दुकान पर पहंुचा, तो दुकान बन्द थी, जबकि बाजार का दिन था और कई ग्राहक सामान लेने खड़े थे। सोच-विचार में डूबा राजेश अपने मालिक मनोज के घर पहंुचा। उसने दरवाजे की कुंडी खटखटाई, तो मनोज ने दरवाजा खोला।
राजेश को देखकर वह बोला, ‘‘आज मेरी तबियत खराब है। तुम जाकर दुकान ‘‘खोल लो। तबियत हल्की हुयी, तो दोपहर बाद तक आ जाऊंगा।’’
‘‘ठीक है भइया, आप आराम करें।’’ कहकर राजेश चाबी लेकर चलने लगा।
तभी मनोज पुनः बोला, ‘‘अरे राजेश आये हो, तो चाय नाश्ता कर लो। अभी मैंने भी चाय नहीं पी है।’’ फिर उसने अपनी पत्नी को आवाज दी, ‘‘अरे ऊषा, जरा दो कप चाय और साथ में कुछ नमकीन ले आओ।’’
ऊषा मन-ही-मन बुदबुदाई। फिर कुछ देर बाद चाय और नमकीन लेकर आई। ऊषा जब झुकर टेª मेज पर रखने लगी, तो राजेश उसे ठगा-सा देखता रह गया। वह कभी मनोज को देखता, तो कभी ऊषा को, जिसके दिलकश चेहरे में गजब का आकर्षण था।
वह मनोज से उम्र में भी कम लग रही थी। लगता था जैसे 20.22 साल की शोख हसीना हो। जबकि मनोज उसके सामने कहीं भी नहीं ठहरता था। वह पहली ही नजर में ऊषा का दीवाना बन गया।
जो हाल राजेश का था, वही ऊषा का। उसने भी हृष्ट-पुष्ट नौजवान राजेश को देखा, तो सोचने लगी, कि काश! ऐसा ही मर्द उसकी जिंदगी में होता, तो जीवन खुशहाल बन जाता। ललचायी नजरों से देखती हुयी ऊषा बैठ गयी और पति से बोली, ‘‘वह कौन है? पहली बार देख रही हूं। कोई खास मेहमान है? कहो तो खाना-वाना बना देती हूं।’’
‘‘अरे नहीं…. नहीं।’’ मुस्करा कर बताया मनोज ने, ‘‘यह राजेश है। बड़ा मेहनती है। दुकान पर काम करता है। जब से यह आया है। दुकान अच्छी चलने लगी है। आटा की सप्लाई भी बढ़ गयी है। आज दुकान नहीं पहंुच पाया, तो चाबी लेने घर आ गया।’’
राजेश, ऊषा का दीवाना बन गया था, अतः किसी न किसी बहाने वह ऊषा के पास पहंुच जाता और उसके रूप सौन्दर्य की तारीफ करता।
राजेश भूल गया, कि उसका रिश्ता नौकर मालकिन का है। ऊषा भी राजेश की तरफ आकर्षित थी। अतः दोनों में हंसी-मजाक होने लगा। कभी कभी यह हंसी-मजाक सामाजिक मर्यादाओं को भी लांघ जाता था, लेकिन ऊषा बुरा नहीं मानती थी।
दरअसल राजेश को ऊषा से मिलने दो बार मौका मिलता था। पहला मौका दिन में दो बजे जब उसकी खाना खाने की छुटटी होती थी। दूसरा मौका तब जब मनोज शाम को दुकान बन्द कर ठेका की ओर बढ़ जाता था।
ऐसी ही एक शाम राजेश ने ऊषा को अपने दिल की बात बता दी। ऊषा ने भी अपनी स्वीकृत दे दी, कि वह भी उसे चाहती है। इतना सुनते ही राजेश ने ऊषा को बांहों में भरकर चूम लिया।

धीरे-धीरे ऊषा ने भी उसकी जांघों पर हाथ रख दिया और उसके शरीर से छेड़छाड़ करने लगी। राजेश, ऊषा की इस हरकत पर हैरान नहीं, बल्कि मन-ही-मन रोमांचित हो रहा था। वह समझ गया था, कि आज उसकी हसरत, जो उसने ना जाने कब से अपने सीने में छिपा कर रखी हुई थी, आज पूरी होने वाली है।

ऊषा द्वारा की जा रही छेड़छाड़ से राजेश भी उत्तेजित होने लगा था। वह धीरे-से बोला, ‘‘भाभी, आप चाह क्या रही हैं, कहीं आप बिस्तर का मजा…।’’
‘‘चुप नादान देवर।’’ एक मादक सिसकी लेते हुए ऊषा ने राजेश के होंठों पर अंगुलि रख दी, ‘‘जब सब समझ रहे हो, तो निठल्लों की तरह क्या बैठे हो?’’ वह उसकी आंखों में झांकते हुए बोली, ‘‘आओ न, दरवाजा बंद है और बिस्तर खाली है।’’ वह शिकायती भरे स्वर में बोली, ‘‘ऐसे में तड़पा क्यों रहे हो? जल्दी से मेरे और अपने वस्त्रा निकाल फेंको इन तपते जिस्मों से।’’
अब तो ऊषा के कामुक रूपी शब्दों के तीरों ने राजेश को घायल करके रख दिया। वह वासना की आग में तिल-तिल जलने लगा। उसने झट से ऊषा को बांहों में भींच लिया और बिस्तर पर लेटा दिया। फिर उसके ऊपर झुक कर उसके गुलाबी होंठों का रसपान करते हुए उसके गोरे, उन्नत दुधिया कलशों को दीवानों की तरह मसलने लगा

‘‘वाह! मेरे राजा।’’ ऊषा ने भी कस कर राजेश के होंठों को चूमते हुए कहा, ‘‘आज तो मेरे बदन की एक-एक हड्डी को चटखा कर रख देना।’’ फिर वस्त्रों के ऊपर ही वह राजेश के ‘हथियार’ को टटोलते हुए बोली, ‘‘इतनी देर से खामखां बेवकूफ बना रहे थे।’’ वह मुस्करा कर बोली, ‘‘तुम्हारा ‘जिस्म’ तो बहुत सख्त हो रहा है।’’ वह मसखरी करते हुए बोली, ‘‘लगता है, तुम्हारी निगाहें पहले से ही मेरे गोरे नाजुक जिस्म पर लार टपका रही थीं।’’

‘‘सही ताड़ा, तुमने मेरी जान।’’ अब राजेश भी उसे पूरी तरह खुल गया, ‘‘मैं तो तुम्हें ना जाने कब से अपने नीचे पीसने के लिए मचल रहा था। जब भी तुम्हें देखता, तो बस यही सोचता था, कि काश! कब ये जिस्म मेरे नीचे होगा, ताकि मैं अपने जिस्म की हर हसरत को तुम्हें रौंद कर पूरा कर सकूं।’’
‘‘ओहो!’’ मुस्करा कर बोली ऊषा, ‘‘तो जनाब छुपे रूस्तम निकले।’’ ऊषा ने मस्ती में उसके वस्त्रों के ऊपर ही उसके खास ‘जिस्म’ को छेड़ते हुए कहा, ‘‘तो अपना ये ‘जिस्म’ ना कब से मेरी ‘देह’ में मन-ही-मन महसूस रहे थे।’’ फिर एक मादक अंगड़ाइे लेते हुए बोली, ‘‘तो फिर आज मन की हसरत पूरी कर लो। मैं तुम्हें नहीं रोकूंगी।’’
फिर ऊषा उसके कान में फुसफुसाते हुए बोली, ‘‘अब इन बैरी वस्त्रों को अपने तन से जुदा करो न।’’ फिर मुस्करा पड़ी, ‘‘तब तक मैं भी अपने वस्त्रा…।’’ और फिर शरमा गयी ऊषा।
फिर देखते ही देखते दोनों ने अपने सभी वस्त्रा अपने तन से जुदा कर डाले और बिस्तर पर एक ओर फंेक दिए। ऊषा ने जब राजेश के जवां, गठीले ‘बदन’ को देखा, तो वह मन-ही-मन रोमांचित हो उठी। उसे लगा आज तो शामत नहीं मेरी ‘देह’ की।
फिर सोचने लगी, कि मजा भी तो इसी में है, कि बिस्तर पर संसर्ग के दौरान पाटर्नर का मजबूत ‘बदन’ उसकी ‘देह’ में समा कर उसकी गहराई को नापते हुए पूर्णतः तृप्त कर डाले।
फिर तो दोनों बिस्तर पर आदमजात अवस्था में एक-दूसरे जिस्म के अंगों को नांेचने-खसोटने लगे। कभी ऊषा उसके खास ‘महमान’ को पकड़ कर झटका देती, तो कभी राजेश उसके अंगों को जोरों से मसलने लगता।
ऊषा पर तो ऐसा नशा चढ़ चुका था हवस का कि वह पागलों की भांति मादक सिसकियां भरी जा रही थी और राजेश को अपने ऊपर खींचते हुए बड़बड़ा रही थी, ‘‘मालकिन समझ कर नहीं, अपनी लुगाई समझ कर प्यार करो। मैंने अपनी देह तुम्हारे हवाले कर दी है, अब तो तुम इसके मालिक हो, जैसे चाहो वैसे मजा लो और प्यार करो।’’
‘‘मजा लूंगा ही जानेमन और साथ ही मजा दूंगा भी।’’ उसके होंठों को बेतहाशा चूमते हुए बोला राजेश, ‘‘आज तेरी जवानी का सारा रस निचोड़ डालूंगा मैं।’’ कहकर जोरों से उसके दुधिया कबूतरों को मसल दिया राजेश ने।
‘‘उई मां।’’ एकदम उचक कर बोली ऊषा, ‘‘कोई रबड़ की नहीं बनी हूं मैं, जो इस प्रकार बेरहमों की तरह नोंच रहे हो मेरे नाजुक अंगों को।’’ फिर मुस्करा कर बोली, ‘‘वैसे जोर दिखाना ही है, तो मेरे नीचे के मयखाने में दिखाना। वह इतनी नशीली शराब है, जिसका नशा तुम्हारे सिर चढ़कर बोलेगा।’’
‘‘हाय तो फिर करा दो न अपने मयखाने के दर्शन मेरी जान।’’ कहकर राजेश ने ऊषा की टांगों को विस्तार दिया और उसके मयखान में उतर गया।
‘‘उफ! ओ मा…।’’ इस बार और भी तेज स्वर में चीखती हुई बोली ऊषा, ‘‘लोहे को बने हो क्या…?’’ वह जबडे़ भींचते हुए बोली, ‘‘हाय…रे चीर डाला मेरा दिल…मजा दो मेरे राजा..सजा नहीं।’’
‘‘मजा भी आयेगा मेरी रानी।’’ बिना रूके और बिना हटे ही बोला राजेश, ‘‘थोड़ा सा सब्र कर लो, उसके बाद देखना। तुम्हारे मयखाने से सारी शराब न चूस ली तो कहना। ऐसे आनंद के सागर में डूब जाओगी, कि बाहर निकलने का मन नहीं करेगा तुम्हारा।’’
फिर वाकई राजेश ने उसके मयखाने की भीगी शराब को ऐसे पीया कि ऊषा चारों खाने चित्त हो गई।
जब वह अपनी चरम पर पहुंच चुकी, तो कसकर राजेश से चिपकती हुई बोली, ‘‘ओह राजेश…श्…आ.उम..बस करो अब। रूक जाओ…मेरा स्टेशन आ गया है। तुम भी उतरो और मुझे भी उतर जाने दो।’’
जिस प्रकार से राजेश ने ऊषा को भोगा था, ऊषा उसके जोश, प्यार करने के अंदाज व उसके सख्त व मजबूत ‘बदन’ के नीचे पिसकर खुद को गर्वित महसूस कर रही थी। उसे अपना पति मनोज, राजेश के आगे एकदम नपुंसक महसूस हो रहा था।
इसके बाद ऊषा के लिए राजेश ही सब कुछ हो गया। उसने पति को दिल से निकाल दिया और उसकी जगह राजेश को दिल में बसा लिया। ऊषा, राजेश का ज्यादा सानिध्य पाना चाहती थी, इसलिए उसने एक उपाय खोजा।
ऊषा ने एक दिन पति से कहा, ‘‘आप दुकान दूकान बन्द करने के बाद पैसे राजेश के हाथ घर भिजवा दिया करें। क्योंकि आपको तो पीने की लत है, किसी ने पैसे मांग लिये या झगडा हो गया, तो नुकसान हो जायेगा।’’
ऊषा की यह बात मनोज ने मान ली। इस तरह ऊषा और राजेश का रिश्ता और भी प्रगाढ़ हो गया।

ऊषा से मिलन की भूख मिटाने के लिए कभी-कभी राजेश रात में मनोज के घर छुपकर बैठ जाता। जब मनोज देर रात नशे में धुत्त होकर घर आता और चारपाई पर पसर कर खर्राटे भरने लगता, तो ऊषा तथा राजेश की रंगीन रातों का सफर शुरू हो जाता। फिर सवेरा होने से पहले राजेश चला जाता।
कहते हैं, कि अवैध संबंधों का भान्डा किसी न किसी दिन फूट ही जाता है। ऐसा ही राजेश और ऊषा के साथ भी हुआ। उस रोज शाम को दूकान बन्द कर मनोज घर पहुंचा और पत्नी से बोला, ‘‘ऊषा मंै अपने दोस्त के घर जा रहा हूं। उसके भाई का तिलक है। रात में घर नहीं लौट पाऊंगा। तुम होशियारी से रहना।’’
यह सूचना ऊषा के लिए काफी संतोष जनक थी। मनोज घर से चला गया, तो ऊषा ने राजेश से मोबाइल पर बात की और तुरन्त घर आने को कहा। राजेश यघपि घर पहंुच गया था, लेकिन ऊषा के प्यार का दीवाना राजेश बहाना बनाकर घर से चल पडा।
कुछ ही देर बाद वह ऊषा के घर पहुंच गया। राजेश के पहंुचते ही ऊषा चिहुंक उठी और बोली, ‘‘आज रात तो मौजा ही मौजा है। तुम्हारे मालिक झीझक गये हैं। कल ही आ पायेंगे।’’

kamvasna antarvasna kahani
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कहते हुए ऊषा ने अपनी बाहों का हार राजेश के गले में डाल दिया। फिर दोनांे कमरे के अंदर कैद हो गये।
सुबह करीब चार बजे मनोज लौट आया। मनेाज ने कमरे का दरवाजा खटखटाया ऊषा को आवाज दी। लगभग पांच मिनट बाद ऊषा ने दरवाजा खोला और उसके दोनों पल्ले को पकड़ कर खडी हो गयी, ‘‘अरे आप!’’ वह बोली, ‘‘इतनी जल्दी आ गये।‘‘
‘‘हां, क्यों?’’ मनोज ने पूछा।
ऊषा के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी और उसकी भयभीत आंखें नीचे झुकी हुयी थी और तभी मनोज को कमरे के अन्दर आहट सुनाई दी, तो उसने पूछा, ‘‘अंदर कौन है?’’
ऊषा ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो मनोज का मन आशंका से भर गया। उसने ऊषा को धकेल कर एक ओर किया और कमरे के अन्दर दाखिल हो गया। अन्दर कदम रखते ही सामने का दृश्य देखकर उसके बदन में आग लग गई। उनका नौकर राजेश पलंग के नीचे छुपने का प्रयास कर रहा था। मनोज उसे देखकर चीखा, ‘‘निकल बाहर। तू तो आस्तीन का सांप निकला।’’
राजेश उठकर खड़ा हो गया। मनोज ने लात घंूसो से उसे पीटा फिर वह भाग गया। ऊषा अभी तक पकडे़ गये चोर की तरह मुंह लटकाए खड़ी थी। मनोज का पूरा शरीर गुस्से से जल रहा था। उसने नफरत से पत्नी की ओर देखा ओर फिर चोटी पकड़ कर उसे जमीन पर पटक दिया। फिर उसे भी लात घूसों से बेतहाशा पीटने लगा। उसने ऊषा को तभी छोड़ा, जब वह उसे मारते-मारते थक गया।
इस घटना के बाद मनोज ने अपने घर में राजेश के आने पर प्रतिबंध लगा दिया तथा नौकरी से भी निकाल दिया। राजेश, ऊषा से मिलने कई दिनों तक नहीं आया। किन्तु वह ऊषा की मोहब्बत के कारण दिल से मजबूर था।
उसकी आंखें ऊषा को देखने के लिए तरसने लगी और दिल बेचैन रहने लगा। जो हाल राजेश का था, वही ऊषा का भी था। वह भी राजेश के बिना जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी।

इधर मनोज ने राजेश को नौकरी से निकाल दिया, तो उसका धंधा चैपट हो गया। आटा की सप्लाई रुकी, तो फुटकर दूकानदारों ने पैमेन्ट रोक लिया। मनोज चक्की चलाने वाले नौकर की खोज कर रहा था, लेकिन कोई मिल नहीं रहा था।
इसी बीच राजेश अपना वेतन मांगने मनोज के पास पहुंचा। मनोज का नरम रुख देखकर राजेश ने माफी मांगी और पुनः काम पर रखने का आग्रह किया। मनोज को भी नौकर की सख्त जरुरत थी, सो न चाहते हुए भी उसने राजेश को नौकरी पर रख लिया।
राजेश नौकरी करने लगा, तो उसके चंचल मन में ऊषा को पाने की चाहत फिर से जाग उठी। एक रोज जब मनोज गेहूं खरीदने मण्डी गया, तो उचित मौका देखकर राजेश, ऊषा के पास पहुंच गया।
राजेश को देखते ही ऊषा की आंखें डबडबा आईं। वह आवेश में आकर राजेश से लिपट गयी। फिर उसने कहा, ‘‘राजेश, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती। शराब के नशे में मनोज आदमी से राक्षस बन जाता है और ताने देकर बुरी तरह पीटता है।’’
राजेश ने ऊषा को सांत्वना देते हुए समझाया, ‘‘भैया ने मुझे माफ कर दिया है। अब सब ठीक हो जायेगा।’’
इसके बाद राजेश और ऊषा का शारीरिक मिलन पुनः होने लगा। लेकिन अब दोनों बेहद सतर्कता बरतने लगे। पर एक दिन सतर्कता के बावजूद पड़ोसी कृष्ण गोपाल की पत्नी रोशनी ने राजेश को ऊषा के साथ आंगन में अश्लील हरकत करते देख लिया। उसने यह बात अपने पति कृष्ण गोपाल को बताई। फिर कृष्ण गोपाल ने मनोज को चेताया।
मनोज ने इस बावत से पूछताछ की तो वह साफ मुकर गयी। इस पर मनोज को गुस्सा आ गया और वह ऊषा को पीटने लगा।
ऊषा पिटने से बचने के लिए त्रिया चरित्रा करने लगी और बोली, ‘‘मुझे क्यों पीटते हो? पीटना ही है, तो उस रोजश को पीटो, जो जबरन मेरे जिस्म से खेलकर चला जाता है।’’ वह मगरमछ के आंसू बहाते हुए बोली, ‘‘मैं लाख मना करती हूं, परन्तु वह अपनी हवस मिटाने के बाद ही छोड़ता है। मैं चीखने की कोशिश करती हूं, तो तुम्हें जान से मारने की धमकी देता है। तब मैं बेबस हो जाती हूं।’’
ऊषा की बात सुनकर मनोज का हाथ जहां का तहां रुक गया। फिर कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘यदि ऐसी बात थी, तो तूने मुझे पहले बताया क्यों नहीं?’’
‘‘कैसे बताती, तुम्हारा धंधा बन्द नहीं हो जाता। तुम्हें याद नहीं, पिछली बार जब तुमने उसे निकाल दिया था, तब धंधा मंदा पड़ गया था। तभी तो तुमने दोबारा उसे नौकरी पर रखा था।’’
‘‘अरे धंधा जाये भाड़ में। एक बार उस दो टके के नौकर राजेश को माफ कर दिया था, तो क्या बार-बार थोडे़ ही माफ कर दूंगा।’’ वह आंखों से अंगारे बरसाता हुआ बोला, ‘‘अब तो मैं उसे सबक सिखा कर ही रहूंगा, लेकिन…?’’
‘‘लेकिन क्या?’’ ऊषा ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘क्या सोचा है तुमने?’’
‘‘मैंने जो भी सोचा है, उसमें तुम्हें मेरा साथ देना होगा।’’ मनोज ने सख्त भाव से पूछा, ‘‘दोगी न मेरा साथ?’’
‘‘म… मु… मझे क्या करना होगा?’’ ऊषा ने थूक निगलते हुए पूछा।
‘‘उसे घर बुलाना होगा। फिर हम दोनों मिलकर उसको सदा के लिए शांत कर देंगे।’’ गंभीर होकर बोला मनोज।
‘‘नहीं, मैं ऐसा नहीं कर सकती। यह तो पाप है।’’ ऊषा घबरा कर बोली।
‘‘जब तुम उस कमीने के साथ रंगरेलिया मनाती थी, तब पाप नहीं था और अब पाप-पुण्य समझा रही है।’’
कुछ देर ना नुकुर के बाद ऊषा, पति का साथ देने को तैयार हो गयी। उसके बाप मनोज व ऊषा ने राजेश की हत्या की योजना बनायी।
इस योजना की जानकारी ऊषा ने राजेश को नहीं दी और पहले जैसा प्यार दर्शाती रही। राजेश को जरा भी आभास नहीं हुआ, कि उसकी मौत का ताना-बाना बुना जा चुका है।
योजना के तहत शाम को राजेश ने दुकान बंद की और चाभी मनोज को देकर घर के लिये रवाना हुआ। अभी उसने कस्बा पार ही किया था, कि मोबाईल की घंटी बजी।
स्क्रीन पर नजर डाली, तो नम्बर ऊषा का था। उसने मोबाईल रिसीविंग वाला बटन दबाया और बोला, ‘‘हां भाभी कहिए, सब ठीक तो है?’’
‘‘तुम्हारे बिना सब ठीक कैसे हो सकता है?’’ मादक स्वर में बोली ऊषा, ‘‘तुम्हारी याद सता रही है। जल्दी अपनी ऊषा के पास चले आओ।’’
‘‘ठीक है भाभी, मैं चन्द मिनटों में आता हूं।’’ मन ही मन ऊषा के गुदाज बदन को पाने की खुशी में चहक रहा था राजेश, ‘‘हाय! क्या मजा आयेगा, जब ऊषा भाभी के वस्त्रा उतार कर उसकी देह में समाऊंगा।’’
कुछ देर बाद ही राजेश ऊषा के घर आ गया। आते ही उसने ऊषा को बाहों मंे भरा तो ऊषा छिटक कर दूर हो गयी और बोली, ‘‘राजेश अबतक तुम जबर्दस्ती करते रहे, लेकिन अब नहीं कर पाओगे। मुझे हाथ लगाया तो पछताओगे।’’

‘‘यह तुम क्या कह रही हो भाभी!’’ हैरत से बोला राजेश, ‘‘मंैने कभी जबर्दस्ती नहीं की, जो मिलन हुआ तुम्हारी मर्जी से हुआ।’’
कहते हुए राजेश ने ज्यांे ही ऊषा को दोबारा बाहों में भरा त्यों ही सामने मनोज आ गया। राजेश को देखकर मनोज उस पर टूट पड़ा और डंडे से उसकी पिटाई करने लगा। राजेश दरवाजे की ओर भागा तो ऊषा सामने आ गयी। उसने कमरे की कंुडी अन्दर से बन्द कर ली।
राजेश पिटते हुए जमीन पर गिर पड़ा। राजेश हाथ पैर चलाने लगा तो ऊषा ने उसके पैरों को

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